29 नियम

जांभोजी ने प्रत्येक जाति, वर्ग और वर्ण के स्त्री-पुरूष को आत्मोत्थान का मार्ग दिखाया तथा नीच और पतित को ऊँचा उठाया था। बिश्नोई सम्प्रदाय प्रवृति के साथ निवृति- साधन का मार्ग है, जिसकी पुष्टि इसके 29 नियम की व्याख्या से भी होती है।






29 नियम की व्याख्या
29 नियम की व्याख्या

29 नियम - 


1.तीस दिन सूतक रखना।
2 .पांच दिन का रजस्वला रखना।
3. प्रातः काल स्नान करना।
4. शील , सन्तोष व शुद्धि रखना।
5. प्रातः सायं सन्ध्या करना।
6. सांझ आरती, विष्णु गुन गाना।
7. प्रातः काल हवन करना।
8. पानी छानकर पीयें व वाणी षुद्ध बोलें।
9. ईंधन बीनकर व दूध छानकर लें।
10. क्षमा - सहनषीलता रखें।
11. दया - नम्रभाव से रहें।
12. चोरी नहीं करनी।
13. निन्दा नहीं करनी।
14. झूठ नहीं बोलना।
15. वाद-विवाद नहीं करना।
16. अमावस्या का व्रत रखना।
17. भजन विष्णु का करना।
18. प्राणी मात्र पर दया रखना। 
19. हरे वृक्ष नहीं काटना।
20. अजर को जरना।
21. अपने हाथ से रसोई पकाना।
22.थाट अमर रखना।
23.बैल को बधिया न करना।
24. अमल नहीं खाना।
25. तंमाखू नहीं खाना व पीना।
26.भांग नहीं पीना।
27.मद्यपान नहीं करना।
28.माँस नहीं खाना।
29.नीले रंग का वस्त्र नहीं पहनना


29 नियम की व्याख्या - 

1. तीस दिन सूतक
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तीस दिन तक प्रसूता स्त्री को गृह कार्य से पृथक रखना चाहिये। उन्नतीस नियमों में यह पहला नियम है। मानव के शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की यही नींव है। यहीं से माानव जीवन प्रारम्भ होता है। यदि यह प्रारम्भिक काल ही बिगड़ जायेगा तो फिर आगे मानवता का विकास कैसे हो सकेगा। शायद दुनियां में प्रथम बार ही जम्भेश्वरजी ने यह तीस दिन सूतक का नियम बतलाया है। वैसे

 सूतक मानते तो सभी हैं किन्तु तीस दिन का किसी भी समाज में नहीं मानते और न ही इस रहस्य को जानते ही हैं। विश्नोईयों के लिए बालक जन्म का सूतक तो तीस दिन का बतलाया तथा मृत्यु का सूतक तीन ही दिन का बतलाया है। इनमें कुछ रहस्य छुपा हुआ है, इस पर विचार करके देखना चाहिये। जब बालक दस महीने तक गर्भवास में निवास करता है, पश्चात समय आने पर जन्म लेता है उस समय माता व बालक दोनों ही अपवित्र अवस्था में हो जाते हैं। शरीर गर्भ से बाहर आया है जिससे गर्भ के सभी भाग वह साथ में लेकर आया है तथा उसकी माता के भी शरीर के अन्दर कमजोरी विकृति पैदा हो गयी होती है। इन दोनों को स्वस्थ तथा पवित्र होने में भी समय चाहिये, समय पाकर ही पवित्रता आ सकती है। इसीलिये तीस दिनों का समय रखा गया है जो सूतक रूप में बताया है तथा तीस दिन पूर्ण हो जाने पर ही संस्कार करके उसे विश्नोई बनाया जाता है तथा मृत्यु का सूतक तीन ही दिन का बताया है क्योंकि वहां पर तो कुछ शेष बचता नहीं है। जीव तीन दिन के पश्चात चला ही जाता है और शरीर तो उसी दिन ही जमीन को समर्पित हो जाता है फिर इतना लम्बा पातक किसके लिए रखा जावे। इसीलिए तीसरे दिन ही जीव की समारोहपूर्वक विदाई तथा मिलन हो जाता है उसी दिन पाहल हवन द्वारा संस्कार कर दिया जाता है। ‘‘आज मूवा कल दूसर दिन है जो कुछ सरै तौ सारी’’ (शब्दवाणी)। दूसरी बात यह है कि तीस दिन तक प्रसूता स्त्री को गृहकार्य से पृथक इसीलिए रखा जाता है कि उसे पूर्णतया विश्राम चाहिये क्योंकि बच्चा पैदा होने से उसके शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाती है। उस कमजोरी की पूर्ति के लिए एक महीना पूर्णतया विश्राम तथा साथ में पौष्टिक भोजन भी दिया जाना आवश्यक है और ऐसा करते भी हैं। इसमें दो कारण हैं। प्रथम तो यह है कि बच्चे की माता का शरीर पुनः क्षति की पूर्ति कर लेगा। यदि ऐसा न हो सकेगा तो कमजोर शरीर से न तो कुछ कार्य ही हो सकेगा और न ही शरीर स्वस्थ ही रह सकेगा। अनेकानेक बीमारियां शरीर को पकड़ लेगी, जिससे कभी भी अकाल मृत्यु हो सकती है। मातृशक्ति तो खेती की तरह होती है, उस खेती को सुधारा जायेगा, उसे खाद पानी आदि देते रहोगे तो वह नित नयी फसल देती रहेगी अन्यथा खेती अच्छा फल नहीं दे सकेगी। दूसरा लाभ यह होता है कि नवजात शिशु को अपनी मां का दूध भरपूर मात्रा में मिल सकेगा। उस समय का अपनी ही माता का पिया हुआ अमृतमय दुग्ध भविष्य में शरीर, मन तथा बुद्धि निर्माण में सहायक होता है। यदि ऊगते हुए वृक्ष को ही पूर्णतया खाद पानी नहीं मिलेगा तो वह कभी भी विशाल वृक्ष नहीं बन सकेगा। विश्नोईयों में यह परम्परा प्राचीनकाल से ही इस नियम के बदौलत चलती आ रही है जिससे सुन्दर बलिष्ठ जवान पैदा होते आये हैं। अन्य लोगों में से इनकी पहचान हो जाती थी। आजकल इन नियमों में कुछ ढ़ील हो जाने से वह बात अब नहीं दिखाई देती।

2. पांच ऋतुवन्ती न्यारो
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पांच दिन के मासिक धर्म में आ जाने पर युवती को गृहकार्य से पृथक रहना चाहिये। 29 नियम की व्याख्या में यह दूसरा नियम है  उन पांच दिनों में वह अपवित्र दशा में होती है। उस समय न तो उसे घर के किसी कार्य में भाग लेना चाहिये, कम से कम भोजन जल को कदापि नहीं छूना चाहिये और न ही रजस्वला स्त्री को ही छूना चाहिये, वह अस्पर्शा होती है। ऐसी दशा में उसका शरीर कच्चा हो जाता है, जिससे कई 

प्रकार के दोषों से दूषित हो जाती है। अनेक रोगों से ग्रसित भी हो सकती है। उसके द्वारा बनाया हुआ भोजन करने से भोजनकर्ता दूषित हो जाता है, वह भी रोगी हो सकता है। इसीलिए अन्य कार्य न करते हुए अपने पति का ही स्मरण करें या फिर देवताओं का या परमात्मा का ही स्मरण करें क्योंकि दृष्टि दोष भी लग जाता है ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’ जैसी दृष्टि पड़ती है संतान भी वैसी ही हो सकती है। वरसिंग वणियाल के प्रसंग में इस बात की पुष्टि होती है। तथा जम्भसार की कथाओं में यह भी प्रमाण मिलता है कि एक रजस्वला स्त्री के हाथ का जल पीने से और उसके शरीर की छाया पड़ने से 350 क्षत्रिय शूरवीर भूत-प्रेतों की योनी में चले गये थे। इसीलिये जीवन में मन बुद्धि का बहुत ही महत्व होता है, उन्हें शुद्ध परम पवित्र रखना परमावश्यक है और वे खाने-पीने से ही अपवित्र होते हैं और अपवित्र दशा में तो यह शरीर बैठ जायेगा या फिर उल्टे कर्म करके नष्टता को प्राप्त हो जायेगा। इससे बचने के लिए इस धर्म का पालन करना माता और बहनों का परम कर्तव्य है तथा पुरुषों को भी इस नियम का पालन करवाने में पूरा सहयोग देना चाहियेे। गाड़ी एक चक्र से नहीं चलती। दोनों बराबर घूमेेंगे, समझौता रखेंगे तभी यह गृहस्थी की गाड़ी चल सकेगी। भावी पीढ़ी निर्माण में आपका बहुत बड़ा सहयोग हो सकता है। आप अपनी संतान को कैसी देखना चाहते हैं यदि अच्छी संतान अच्छा परिवार तथा देश देखना चाहते हैं तो इस नियम का अवश्य ही पालन करें तथा करवायें। पांचवे दिन सभी कपड़े धोकर शुद्ध पवित्र हुआ जाता है, उसके बाद ही गृहकार्य तथा सांसारिक व्यवहार करना चाहिये। यदि आप पुत्र की प्राप्ति चाहते हैं तो छठे, आठवें, दसवें, बारहवें, चवदहवें दिन और यदि पुत्री चाहते हैं तो इनसे विपरीत दिनों में व्यवहार कर सकते हें, ऐसी शास्त्रों की विधि है।

3. सेरा करो स्नान
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प्रतिदिनः प्रातःकाल में ही स्नान करना चाहिये। 29 नियम की व्याख्या में यह तीसरा नियम है ‘सेरा उठै सुजीव छांण जल लीजियै, दांतण कर करै सिनान जिवाणी जल कीजियै’’ (बत्तीस आखड़ी {वील्हाजी})। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सर्वप्रथम शौचादि क्रिया से निवृत होकर दांतुन करे, फिर छाणकर जल ग्रहण करके स्नान करें। यहीं से जीवन गति प्रारम्भ होती है। स्नान करने के पश्चात ही अन्य कोई घर का 
कार्य या पूजा पाठ हवनादिक हो सकता है। बिना स्नान किये तो कुछ भी शुभकार्य नहीं हो सकता। रात्रि में हम लोग शयन करते हैं तो एक प्रकार की मृत्यु ही हो जाती है, बुरे स्वप्न आते हैं, आलस्य का आक्रमण हो जाता है जिससे शरीर अस्वस्थ, आलसी, किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। कोई भी शुभ दिनचर्या नहीं बन पाती। इन्हीं सभी शारीरिक दोषों की निवृति के लिए प्रातःकाल स्नान का विधान किया है। प्रातःकालीन स्नान से शरीर शुद्ध पवित्र तथा स्वस्थ होगा तो इस शरीर में स्थित मन, बुद्धि आदि भी पवित्र होंगे तथा सभी कार्य सुरुचिपूर्ण और सफलतापूर्वक ही होंगे। शब्द नं. 104 के प्रसंग में जम्भदेवजी ने वस्त्र, हाथी, घोड़ा, घी आदि के अत्यधिक दान से भी अधिक महत्वपूर्ण स्नान को स्वीकार किया है क्योंकि दान का प्रभाव तो क्षणिक होता है किन्तु स्नानादिक पवित्र दिनचर्याओं का प्रभाव दीर्घकालीन होता है इनसे जीवन का निर्माण होता है। इस स्नान करने के नियम के कारण तो विश्नोई को अन्य लोग स्नानी कहते हैं और बड़ी ही श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि जो प्रातःकाल स्नान करेगा वह निश्चित ही परमात्मा के नाम का स्मरण, संध्या,हवनादिक शुभ कार्य करके उसके बाद ही अन्य कार्य करेगा। वह निश्चित ही धार्मिक व्यक्ति होगा तथा उनका अन्य लोगों से अधिक शरीर स्वस्थ रहेगा, प्रत्येक कार्य करने में सबसे आगे रहेगा। यही सभी कुछ एक स्नान की बदौलत से ही सम्भव हो सकता है। कुछ वर्ष पूर्व तक इस स्नान के नियम का पालन अच्छी प्रकार से होता था। छोटे बच्चे को भी विश्नोई के घर में बिना स्नान किये भोजन नहीं खिलाया जाता था, सभी के लिए स्नान करना अनिवार्य था। जिससे आगे चलकर आदत पड़ जाने से बिना स्नान किये भोजन नहीं कर सकते थे किन्तु इस समय कुछ शिथिलता नजर आ रही है। नियम की यह महत्वपूर्ण कड़ी यदि टूट जावेगी तो फिर यह श्रृंखला कैसे जुड़ पायेगी। अन्य शास्त्रकार इस नियम की महत्ता को नहीं देख पाये थे इसीलिए अधिक चर्चा का विषय नहीं बन पाया किन्तु जम्भदेवजी ने ठीक से पहचान करके अपने शिष्यों के प्रति बतलाया है। इसीलिए सभी के लिए पालनीय है।

4. शील
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शील व्रत का पालन करना चाहिये। शील शब्द के प्रसंगानुसार कई अर्थ हो सकते हैं किन्तु यहां उन्नतीस नियमों में जो इस शील शब्द का प्रयोग किया है इसका अर्थ है कि स्त्री के लिए पतिव्रता धर्म का पालन करना तथा पुरुष के लिए एक पत्नीव्रत धर्म का पालन करना। पति-पत्नी में तथा संसार की मर्यादा को बांधने वाला एक यही शीलधर्म है। इस शील धर्म से ही आपसी पिता पुत्रादि मर्यादा

यें सीमायें जुड़ती है। यदि यह शील धर्म ही खण्डित हो जायेगा तो कौन किसका पिता कौन किसका भाई बहिन होगा तथा कौन किसके पालन पोषण का भार अपने ऊपर लेगा। पारिवारिक स्नेह कैसे जुड़ सकेगा, उसके बिना तो समाज ही बिखर जायेगा। पति-पत्नी के बीच के मधुर सम्बन्ध को जोड़ने वाला शील ही होता है जिससे परिवार समाज देश मर्यादित होकर चलता है तथा यह शील व्रत ही मानवता तथा पशुता में भेद करता है। इसी भेद से ही मानव पशुता से ऊपर उठकर अपनी उन्नति में अग्रसर होता है। हिन्दू समाज ही नहीं सम्पूर्ण मानव के लिए यह धर्म पालन करना परमावश्यक है। जहां पर भी शीलव्रत खण्डित हुआ है वहीं पर पारिवारिक जीवन नरकमय बन गया है तथा कहीं-कहीं पर सम्बन्ध टूट भी जाते हैं। एक बार शील टूट गया तो फिर दुबारा कभी भी जुड़ता नहीं है। इसीलिए सुख शांति चाहने वाले सभी सज्जनों के लिए शीलव्रत पालनीय है।

5. सन्तोष
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अपने ही परिश्रम के द्वारा जो यथा कर्मानुसर फल मिल जाये उसी फल में ही संतुष्ट रहना ही संतोष कहलाता है। इसक विपरीत धन प्राप्ति के लिए दिन रात होने वाली इच्छा का प्रसार ही लोभ कहलाता है। लोभ से होने वाले दुःख का कोई आरपार नहीं है। एक वस्तु की प्राप्ति हो जानेपर झट दूसरी वस्तु प्राप्ति की इच्छा हो जातीहै। उसी प्रकार ‘संतोषादनुत्तम सुखलाभः’ संतोष
से अतिउतम सुख का लाभ होता है क्योंकि यथा आवश्यकतानुसार जो कुछ भी प्राप्त हो जाता है उनमें ही संतुष्टता होती है। कहा भी है- गोधन गजधन बाजी धन और रत्न धन खान। जो आवैसंतोष धन, सब धन धूड़ समान।। संतोषी सदा सुखी और लोभी सदा दुःखी ही रहता है। गुरु
जम्भेश्वरजी ने उन्नतीस नियमों में संतोष कोभी स्थान दिया है। धन, दौलत, स्त्री, पुत्र, परिवार आदि सभी कभी कुछ होते हुए भी संतोष रहित लोभी मनुष्य का जीवन नरकमय ही बन जाता
है। आखिर यह जीवन इस प्रकार की बर्बादी के लिए तो नहीं मिला है। इसका सदुपयोग तो करना ही चाहिये। इस जीवन को प्राप्त करके सुख की प्राप्ति तो होनी ही चाहिये। इसीलिए सभी शास्त्रों से
सहमत यह संतोषमय जीवन जीने की कला सिखलाई है। इसे धारण करके कोई भी चाहे धनी हो या निर्धन, छोटा हो या बड़ा हो, अपने जीवन को सफल बना सकता है।

6. शुचि प्यारो-
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बाह्य तथा आभ्यान्तर अर्थात् शरीर की शुद्धता तथा मन बुद्धि की शुद्धता से प्रेम रखना चाहिये। सदा ही अपना ध्यान इस और बना रहे तथा शुद्धता के लिए प्रयत्नशील रहें। शरीर की शुद्धि तो मिट्टी जल से होती है और मनबुद्धि की शुद्धि अच्छे विचारों से, भगवान केभजन करने से तथा सत्य बोलने आदि से होती है। इस प्रकार की शुद्धता के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। शब्दवाणी में भी कहा है- ‘तन मन धोइये संजम होइये हरख न खोइये।’’ तथा दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि पवित्र प्रेम एक दूसरे के प्रति सदा बनाये रखें क्योंकि आपस के पवित्र प्रेमाभावसे
ही दुनिया का सम्पूर्ण व्यवहार सुचारू रूप से चल पाता है। जहां पर प्रेमभाव में स्वार्थ आ जाता
है वहांपर प्रेम में पवित्रता नहीं रह पाती, वहां तो मोह हो जाता है। मोह तो सदा दुःखदायी तथा स्वार्थ से भरा रहता है किन्तु प्रेमभाव सदा ही निर्मोही तथा परमार्थी होता है। प्रेम भाव से सेवा,सहायता करने में अनुपम सुख मिल पाता है, संसार का व्यवहार ठीक से चलता है। सभी मानव सामान्य रूप से जीवन व्यतीत करते हुए क्षमा, दया, दाक्षिण्यादि गुणों को धारण कर लेते
हैं।  इसी नियम द्वारा सृष्टि के सभी छोटे-बड़े प्राणियों से निष्काम भाव से परम पवित्र प्रेम करना सीखा जा सकता है, इसी से ही जीओ और जीने दो का सिद्धांत कायम हो सकता है तथा कण-कण में प्रभु परमात्मा की ही ज्योति छटा बिखर रही है सभी जीवमात्र उसी परमात्मा की ही सन्तान हैं हम भी वहीं है जो ये हैं। ऐसा शुद्ध ब्रह्ममय सिद्धांत कायम होता है। इसीलिए अपने पराये का भेदभाव भुलाकर सभी के प्रति प्रेमभाव रखना चाहिये।

7. संध्या-
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प्रातःकाल सूर्योदय तथा सांयकाल सूर्यास्त समय को संध्या समय कहते हैं। उस समय रात्रि तथा दिन की संधी वेला होती है। प्रातः काल की संधी वेला में तो रात्रि की समाप्ति तथा दिन का आगमन होता है तथा सायं समय तो दिन की विदाईऔर रात्रि का आगमन होता है। ऐसी वेलाही पवित्र मानी जाती है क्योंकि यह बेला हमें प्रातःकालीन जीवन यानीमानव शरीर प्राप्ति का संकेत
करता है और दुपहरी जवानी और सायं वृद्धावस्था को प्राप्त होते हुए मृत्यु का संकेत देती है तथा दूसरे दिन पुनः नया जीवन प्राप्ति का संकेत देती है तथा प्रातःकाल सूर्योदय वेला में संध्या करके
फिर हम दिन काकार्य प्रारम्भ करें तथा सांय सूर्यास्त के समय अपना कार्य छोड़कर पुनः परमात्मा की प्रार्थना रूपी संध्या करके विश्राम करें। शब्दवाणी में कहा भी है-
ताती बेला ताव न जाग्योठाडी बेला ठारूंबिम्बे
बैला विष्णुन जंप्यो, तातै बहुत भयी कसवारूं।
संध्या उपासना तो वैदिक काल से ही परम्परा चली आयी है क्योंकि यह एक अति सुन्दर परम्परा थी जिसकी रक्षा करना परमावश्यक था। इसीलिए जम्भेश्वरजी ने उन्नतीस नियमों में यह एक नियम बतलाया। प्रातः सूर्योदय के साथ तथा सायं भी सूर्यास्त के समय में हाथ-पांव धोकर या स्नान करके उतर की तरफ मुख करके एकान्त शुद्धस्थान में आसन लगाकर बैठें। आवश्यकतानुसार हाथ में माला लेकर या बिना माला भी परमात्मा विष्णु को हृदय में धारण करके मुख से ‘ओ३म्- विष्णु’ इस महामंत्र का जपकरें। ‘यज्जपस्तदर्थ भावनम्’ जिसका भी जप
किया जायेवैसी मानसिक भावना अर्थात् ध्यान भी करना चाहिये। ध्यानपूर्वक प्रेमभाव से लिया हुआ परमात्मा का नाम ही अनन्त गुण फल वाला होता है। परमात्मा विष्णु की महिमा स्मरण के लिए, परमात्मा के प्रति अनंत गुण फल वाला होता है। परमात्मा विष्णु की महिमा स्मरण के लिए, परमात्मा के प्रति श्रद्धा से समर्पित होने के लिए वृहन्नवण संध्या का पाठ अवश्य ही करना चाहिये। ऐसी परम्परा तथा विधिविधान है। इस नियम का नित्यप्रति पालन करें। समय यदि ज्यादा नहीं दे सकते तो भी छोड़ना नहीं चाहिये। नियम का मतलब ही यही होताहै कि अबाध गति से कार्यक्रम चलता रहे, बीच में टूटे नहीं, यही नियम की सार्थकता होती है।

8. सांझ आरती
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संध्या पूर्ण हो जाने के पश्चात रात्रि का समय हो जाता है। उस समय में भी व्यर्थ की निंदा या आलबाल की बातों में समय नष्ट न करो। जैसी तुम वार्ता करोगे या सुनोगे, वैसा ही संस्कार तुम्हारे अन्दर आयेगा। उसी संस्कार से ही आप अपना जीवन व्यतीत कर सकोगे। इसीलियेअच्छे संस्कारों के लिए तथा परमात्मा की अनुकम्पा के लिए रात्रि में सभी परिवार के लोग मिलकर बैठो और आरती करो अर्थात् आर्तभाव से समर्पण भाव से प्रभु परमात्मा की पुकार करो। परमात्मा के गुणों का ही बखान करो यानी सत्संग चर्चा ही करो। जिससे तुम्हारे संस्कार पवित्र
बनेंगे उससे जीवन में खुशहाली आयेगी। यह भी एक नियम है, नियम कोतोड़ना नहीं चाहिये।
एक बार यदि टूट गया तो फिर दुबारा जुड़ना कठिन हो जाता है। फिर नियमाभाव में जीवन उदण्ड हो जाता है जिससे समाज में अव्यवस्था फैलती है। इन्हीं मर्यादाओं  में बांधने के लिए ये नियम बतलाये हैं। सांयकाल में आरती बोलने के लिए प्रथम तोस्वयं याद करो, बाद में सस्वर प्रेमभाव से गाओगे तो अन्य लोग भी आपकी तरफ आकर्षित होंगे, इससे उनका भी जीवन सफल हो सकेगा। इसीलिए गुण एक लाभ अनेक होंगे। यही सांझ आरती गुणगान का महत्व है। 
 
9. 
हवन
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सभी के हित के लिए सचेत होकर तथा प्रेमभाव से हवन करो तो मुक्ति पद को अवश्य ही प्राप्त कर लोगे। केवल हवन करना ही पर्याप्त नहीं है, हवन करने के साथ-साथ हित-चित और प्रीत की भावना भी जुड़ी हुई होनी चाहिये। ऐसी पवित्र भावना द्वारा किया गया कर्तव्य कर्म कभी भी बंधन में डालने वाला नहीं होगा। यज्ञ के अवसरपर हम घृतादिक आहुति अग्निदेवता को समर्पित करते हैं। वह स्वाहा द्वारा दी गयी आहुति से सभी देवता तृप्त होते हैं तथा विष्णु परमात्मा तक वह
आहुति पंहुचती है तो सम्पूर्ण विश्व ही तृप्त हो जाता है। उस आहुति के बदले में हम उनसे कुछ
भी नहीं चाहते तो भी देवताओं की प्रसन्नता का अर्थ है वे कुछ न कुछ अवश्य ही प्रदान करेंगे। यदि ये सूर्य, चन्द्र, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी आदि प्रसन्न हो जाते हैं तो यहां मृत्युलोक के सभी प्राणी दैविक, दैविक भौतिक तापों से छुटकारा पा जाते हैं। देवता हमें दिन रात अजस्त्र प्रवाह से देते ही रहते हैं। हम उनके लिए क्या दे सकते हैं उनके ऋण से उऋण होने का उपाय मात्र यज्ञ ही हो सकता है। इसीलिये यज्ञकरने में सभी का कल्याण निहित होता है। वेदोंमें कहा है कि ‘स्वर्गकामोयजते  स्वर्ग सुख की कामना वालायज्ञ करें तथा प्राचीनकाल से ही हिन्दू बड़े-बड़े यज्ञ करते भी आये हैं किन्तु उस समय से अद्यपर्यन्त यज्ञ करने का एकाधिकार ब्राह्मण जाति विशेष
के पास ही था। वे लोग जैसा चाहते वैसा मनमानी दक्षिणा लेकर करते थे। इससे तो नित्यप्रति प्रत्येक घर में प्रातः सांयकाल यज्ञ नहीं हो सकता था किन्तु यज्ञ करना तो नित्यप्रति ही चाहिये। इस समस्या का समाधान करने के लिए जम्भदेवजी ने ही सर्वप्रथम एकाधिकार समाप्त करके
सभी को पूर्ण अधिकार दे दिया। वह चाहे किसी जाति का पुरुष हो या स्त्री हो अथवा बच्चा ही क्यों न हो यह शुभकार्य तो सभी को करना ही चाहिये। पवित्रता शुद्धता आचार-विचारवान मानव
तो सभी एक ही हैं, वे तो सभी अधिकारी हो सकते हैं। इसीलिए प्रत्येक विश्नोई के घर में हवन अवश्य ही होता आया है। उसके लिए घर में जो भी समझदार सदस्य उपस्थित रहेगा, वह प्रेमभाव से यह अवश्य ही करेगा। उन्नतीस नियमों में नित्यप्रति पालनीय यह हवन नियम भी है। 



10- जलदूध और ईंधण का छानना- 

जल, दूध को तो छान करके पीना चाहिए और लकड़ी, उपले आदि को झाङ करके जलाने चाहिए, यही उनका छानना है क्योंकि देखा गया है कि लकड़ी आदि ईंधन में छोटे-छोटे कीड़े दीमक आदि इकठ्ठे हो जाते हैं या ईंधन को झाङ कर काम में नहीं लेंगे तो वे सभी लकड़ी के साथ ही जल कर भस्म हो जायेंगे। उन असंख्य कीड़ों को मारने का पाप आप पर अवश्य ही लगेगा। थोड़ी-सी असावधानी से बहुत बड़े अपराध से बच जाते हैं। इन कीड़ों की अग्नि में जलाने से तो आपका कोई स्वार्थ तो सिद्ध नहीं होता है किन्तु यह सभी कुछ असावधानी के कारण ही हो जाता है। इसी प्रकार जल में भी छोटे-छोटे जल के जीव रहते हैं, उस जल को यदि हम वस्त्र से छान करके नहीं पीयेंगे तो वे सभी कीड़े पेट में चले जायेगें। वे कीड़े  तो आपके द्वारा मृत्यु को प्राप्त होंगे ही, साथ में अनेक प्रकार की बीमारियाँ भी पैदा हो जायेंगी उनसे आपको जूझना पड़ेगा। इसलिए कहा है-"पानी पी तू छान कर निर्मल बाणी बोल, इन दोनों का वेद में नहीं मोल कछु तोल" इसी प्रकार से दूध भी छान करके ही कार्य में लेना चाहिए क्योंकि उसमें भी कभी-कभी गऊ भैंस
आदि के रोयें आदि अंदर गिर जाते हैं।

11. बांणी-
मुख से उच्चरित होने वाले शब्द को भी छानकर अर्थात् सत्य, प्रिय हितकर बोलना चाहिए।
"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रुयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म सनातनः" सत्य बोलना चाहिए, साथ में प्रिय भी होना चाहिए। अप्रिय यदि सत्य है तो भी नहीं बोलना चाहिए और यदि प्रिय शब्द है  किन्तु झूठा है तो भी नहीं बोलना चाहिए यही सनातन धर्म है। "सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप, जांके हृदय सांच है ताके हृदय आप" तथा यही बात गुरु जम्भेश्वर जी ने कही है- "सुवचन बोल सदा सुहलाली" अच्छे वचनों को बोलोगे तो सदा खुशहाली रहेगी। "वाणी एक अमोल है जे कोई बोले जान, हिये तराजू तोल कर तब मुख बाहर आन" तथा च - "क: परदेश प्रिय वादीनाम्" प्रिय बोलने वालों के लिए परदेश क्या होता है। सभी इनके
अपने ही होते हैं। जगत में हम देखते हैं कि सत्य पर ही हिदायतें देखे गये है। सत्य ही परमात्मा है, सत्य व्यवहार से ही परमात्मा तत्व की प्राप्ति तथा लौकिक यश, प्रतिष्ठा, नुखी, यशस्वी जीवन जीया जा सकता है। इसलिए सभी को सत्य का पालन करते हुए जीवन कला सीखनी चाहिए। ऐसी ही जम्भेश्वर जी की इस नियम द्वारा आज्ञा है। लोक व्यवहार में हम एक-दूसरे का सामान्य
वार्ता करते हुए सुनते हैं तो वे लोग गाली द्वारा ही शब्द बोलते हैं जिससे आपस में वैमनस्य बैर विरोध लड़ाई-झगड़े देखे गये हैं। यदि उसी वाणी को ही मधुर हितकर प्रेमभाव से बोला जाये तो आनंद का लहर दौड़ जाती है। यह वाणी सत्य सनातन है देव मानव सभी लोग सुनते है अच्छी वाणी से सभी लोग प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।



12. क्षमा और दया-
सदा ही क्षमा भाव तथा प्राणियों पर दया हृदय में भाव ये दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के आश्रित
हैं। यदि आपके अंदर क्षमा भाव होगा तो किसी पर दया कर सकते हैं और यदि आपके अंदर दया भाव हो तो आप क्षमा भी कर सकते हैं। एक भाव के उदय होने से दूसरा उसके पीछे अपने-आप चला आयेगा, इसलिए दोनों को एक ही नियम के अंदर रखा गया है। यदि किसी ने आपके प्रति कोई अपराध भी कर दिया है तो उस पर दया करके क्षमा कर दें। यह क्षमा तो आप अपने से कमजोर पर ही कर सकते हैं। आप अपने बल से उसको दबा सकते थे किन्तु दयावश उसके अपराध को क्षमा कर दिया। ऐसा करने से वह अपनी गलती समय पाकर अवश्य ही सुधार लेगा। यदि आपसे कोई ताकतवर अधिक है उसका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो निराश लो सकते हैं उसे क्षमा नहीं कहा जा सकता। क्षमा तो उसे ही कहना चाहिए जिसमें आप समर्थ होकर भी दयावश क्षमा कर सकता।क्षमा तो उसे ही कहना चाहिए जिसमें आप समर्थ होकर भी दयावश क्षमा कर देते हैं। यह क्षमाशीलता अनेक प्रकार के झगड़ों उपद्रवों के शमन का कारण होती है। क्षमाशीलता से ही सुख शांति रह सकती हैं। इसी प्रकार दया भाव यदि आपके अंदर है तो आप दुःखी प्राणियों की सेवा कर सकते हैं। असहाय दुःखी प्राणी की सेवा दयाभाव से ही हो सकती है। इसलिए कहा है- "दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छोड़िये, जब लग घट में प्राण।" 'अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम्, परोपकाराय पुष्याय पापाय पर पीडनम्।' अठारह पुराणों में व्यास जी के दो ही वचन प्रमुख हैं कि परोपकार करना ही पुण्य है तथा निर्दयता से दूसरे को पीड़ा देना ही पाप है। इसलिए दया से धर्म की उत्पत्ति होती है और निर्दयता से पाप की वृद्धि होती है।


13. चोरी
चोरी नहीं करना चाहिए। किसी दूसरे के धन को छिपकर ले जाने को सामान्य रूप से चोरी कहते हैं। अनधिकार किसी अन्य के कमाये हुए धन-दौलत को अपना मान कर छीन लेना, उसे उस आवश्यक धन से वंचित कर देना यह बहुत कष्टदायी कर्म है। दूसरों को उन आपके कर्मों से
कष्ट पहुँते वही तो पाप होता है। इसी चौय्-र्य कर्म से पाप होता है तो कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। चोरी न करना यह नियम सभी जनसाधारण के ऊपर लागू होता है। इसीलिए सरकार ने भी कानून बना रखा है चोरी करने वाले को दंडित करती है। यदि इस नियम का पालन न किया जाये तो सभी और अव्यवस्था फैल सकती है। कहीं किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। कोई तो धन कमायेगा तथा अन्य बलिष्ठ जन उसका हरण कर लेगा, इससे समाज नहीं चल सकेगा। इसीलिए सभी जनसाधारण के लिए संसार में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत के लिए तथा परलोक सुधार इन दोनों के लिए इन नियमों का पालन करना परमावश्यक है।



14. निंदा
दूसरों की निंदा नहीं करना चाहिए। अपने अवगुणों को छिपाकर दूसरों के अवगुणों को प्रकट करना ही सामान्य रूप से निंदा करना कहलाता है। निंदक लोगों का यह कर्तव्य कर्म ही हो जाता है कि वह दूसरों के गुणों को छिपाकर केवल उनके अवगुणों का ही चिंतन मनन करता रहता है। इसके उसके दुर्गण मिट तो नहीं जाते किन्तु व्यक्ति जैसा चिंतन करता है वह स्वभाव में उसके आ जाता है, वैसा ही जीवन उसका बन जाता है। "परनिंदा पापा सिरै भूल उठावै भार" दूसरों की निंदा करना यह शिरोमणी पाप है। मूर्ख लोग इस पाप के बोझ को उठाकर वैसे ही भार मरते हैं। "नींदक नेड़े राखिये आँगन कुटी छपाय। बिन पाणी साबुणा मेल धूपे धुपजाय।" निंदक मेरा मती मरो वे तो बड़ा सपूत, मोह बैठावै सुरग में आप भूत का भूत।" "जपो विष्णु निंदा न
करणी।" दूसरों की निंदा करने में भी कुछ रस जरूर आता है। उस रस की प्राप्ति के चक्कर में अनेक प्रकार की कलह लड़ाई-झगड़े इसी के बदौलत देखे गये हैं। कभी-कभी रस में नीरसता आ जाती है तथा समय को व्यर्थ में गमाने का तो यह निंदा रस बहुत बड़ा साधन ही है। इसीलिए जीवन में सदा सुख शांति रखना चाहते हैं तथा दूसरों को भी सुख देने वाला पुण्य कर्म करना चाहते हैं तो परायी निंदा कभी न करें। यदि कुछ कहने की हिम्मत हो तो अपनी ही निंदा करें, अपने ही दुर्गुणों को प्रकट करके उनसे छूटने का उपाय करें यही निंदा न करने का फल है। किसी कवि ने निंदक लोगों पर अपना रोष प्रकट किया है।
यथा---- छप्पय---
जीवो राज सुरायजीवो नर पर उपकारी।
जीवो जगदातार जीवो पतिवरता नारी।
जीवो सिद्ध अरू साधुजीवो योगी निर्मोही,
जीवो जल थल के जीव,मरो संतन के द्रोही।
ईश्वर गिरि त्रिलोक मेंऔर सकल आनंद करो।
जो संतन की निंदा करेतिन के सिर विद्युत परो। 


15. झूठ
झूठ नहीं बोलना चाहिए, सदा सत्य बोलना चाहिए।अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए लोग झूठ बोल देतेहैं। इससे दूसरे का कार्य बिगड़ जाता है जहाँ पर स्वार्थता, लोभ, कुटिलता का व्यवहार अधिक होगा। वह झूठ बोलने से ही हो पाता है। झूठ बोलकर धोखा बार- बार नहीं दिया जा सकता। एक दोबार झूठ बोलकर भले ही स्वार्थ सिद्धि कर ले परंतु बार- बार ऐसा नहीं हो सकेगा क्योंकि उस व्यक्ति पर विश्वास सदा के लिए ही समाप्त हो जाता है तथा विश्वास समाप्त होने से लोक में इज्जत, व्यवहार, मान्यता सभ कुछ समाप्त हो जाता है। इसीलिए सत्य का पालन दृढ़ता से करना चाहिए। सत्य बोलना ही सभी धर्मों का मूल है। सत्य ऊपर ही संपूर्ण पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य से ही पवन चलता है, सुर्य तपता है, सत्य से ही संसार का संपूर्ण व्यवहार चलता है। जिन लोगों ने सत्य धर्म का पालन किया, उनकी ही महिमा उद्यपर्यंत गायी जाती है वे ही सम्माननीय महापुरुष हैं। कहा भी है- ।। सत्यमेव जयते नानृतम् पंथा।। सदा सत्य से ही विजय होती है, झूठ से कदापि नहीं। ।। सत्यंवद धर्म जर।। सत्य ही बोलें, धर्म का ही आचरण करें, ऐसी आज्ञा वेद भी देता है यही आज्ञा गुरु जम्भेश्वरजी ने इस नियम द्वारा दी है जो सदा ही पालनीय है।



16. ।।व्यर्थ का विवाद।।
व्यर्थ का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए किसी तत्व के सूक्ष्म विचारों द्वारा तह तक पहुँचना वाद कहलाता है जो अच्छा भी कहा जा सकता है। ऐसी तत्व अन्वेषण विषय वार्ता तो होनी चाहिए। परस्पर वार्ताओं द्वारा ही तत्वकी खोज की जा सकती है। ऐसे विचार करने वाले जनसमूह
को तो संगोष्ठि कहते हैं किन्तु इसके अतिरिक्त भी कुछ लोगों का ऐसा भी विचार होता है कि सामने वाले जन को अपनी वाक तर्क शक्ति के द्वारा किसी प्रकार से पराजित कर
दिया जाय। या कुछ लोग स्वयं जानते हुए भी दूसरे की परीक्षा लेने के लिए उससे पूछेंगे तथा ऐसी बिना सिर पैर की बातें जिनका कोई मतलब ही नहीं होता और कुछ लोग तो कुछ न
जानते हुए भी पांच सात इकठ्ठे होकर मूर्खता का परिचय देते हुए जिद ही करेंगे।
वहाँ पर लड़ाई-झगड़े, मनमुटाव बैर द्वेष भावादि अनेक प्रकार की बीमारियाँ खड़ी हो जाती हैं यही सभी कुछ व्यर्थ के वाद-विवाद के अंतर्गत ही आता है। शब्दवाणी में कहा है -।।वाद-विवाद फिटकार प्राणी, छाडो मन हट मन का भाँणों। वाद- विवादेदाणू खीणा, ज्यूं पहुपे खीणा भंवरी भंवरा।। मनुष्य जिद या वाद भी इसीलिए ही करता है कि मैं ही बड़ा हूँ और ज्ञानी हूँ तथा मेरी बात ही चलनी चाहिए क्योंकि मुझे अच्छी लगती है। यदि उसकी मिथ्या बात का कोई खंडन कर दे तब वह तीलमिला उठेगा, कभी भी उसके प्रतिवाद को सहन नहीं कर सकेगा। यही तो ईर्ष्या, द्वेष और प्रेम बंधन टूटने का कारण है। व्यर्थ के विवाद में निश्चित ही अमूल्य समय नष्ट होता है। उस समय का अच्छे प्रगतिशील कार्यों में सदुपयोग कर सकते हैं। अच्छे विचारों का आदान-प्रदान द्वारा ज्ञान की वृद्धि कर सकते हैं। इसलिए बुद्धि का सदुपयोग करें, व्यर्थ के झगड़े में
पड़कर ज्ञान का दुरुपयोग न करें। ।।विद्या विवादायं धनं मदाय, शक्ति परपीड़नाय। खलस्य साधोर्विपरीतमेतत ज्ञानाय च रक्षणाय।। दृष्ट आदमी के पास आयी हुई विद्या का व्यर्थ में विवाद करके दूरुपयोग करेगा। ऐसे ही धन से मदमस्त होगा और शरीर शक्ति से दूसरों को कष्ट ही देगा किन्तु सज्जन के पास यदि विद्या होगी तो उससे ज्ञान देगा, धन होगा तो दान देगा और शक्ति होगी तो पीड़ित दुःखी प्राणी की रक्षा करेगा।



17. अमावस्या का व्रत- अमावस्या को व्रत करना चाहिए अर्थात् निराहार रहकर उपवासकरना चाहिए। उप= समीप, वास= आवास अर्थात परमात्मा के समीप रहना चाहिए। अमावस्या के दिन ऐसे ही कर्म करने चाहिए जो परमात्मा के पास में ही बिठाने वाले हों, सांसारिक खेती-बाड़ी व्यापार आदि कर्तव्य तो दूर हटातेहैं और संध्या, हवन, सत्संग परमात्मा का स्मरण ध्यानादि कर्म परमात्मा के पास बिठातेहैं। इसीलिए महीने में एक दिन उपवास करना चाहिए और वह दिन
अमावस्या का ही श्रेष्ठ मानाहै क्योंकि सूर्य और चन्द्र्मा ये दोनों शक्तिशाली ग्रह अमावस्या के दिन एक राशि में आ जाते हैं। तब तक दोनों एक राशि में रहते हैंतब तक रहते है तब तक ही अमावस्या रहती है। चन्द्रमा सूर्य के सामने निस्तेज हो जाता है अर्थात चन्द्र की किरणें नष्ट प्रायः हो जाती हैं। संसार में भयंकर अंधकार छा जाता है। चन्द्रमा ही सर्व औषधियों में रस देने वाला है जब चन्द्रमा ही पूर्ण प्रकाशक नहीं हो सकेगा तो औषधि भी निस्तेज हो जायेगी। ऐसा निस्तेज हुआ अन्न, बल, वीर्य, बुद्धि आदि को मलीन करने वाला ही होगा। इसीलिए अमावस्या को अन्न खाना निषेध किया गया है और व्रत का विधान किया गया है। एकादशी या सोम, रवि आदि तिथियां तो अति शीघ्र सप्ताह में एक बार या महीनों में कई बार आ जाते हैं। साधारण
किसान लोग परिश्रम करने वाले इतना कहां कर पाते हैं। ये सभी व्रत होना असंभव है किन्तु अमावस्या तो महीनें में एक बार ही आती है। सभी कार्यों को छोड़कर तीस दिनों में एक दिन तो पूर्णतया परमात्मा के नाम पर समर्पण कर सकते हो, इसमें सुविधा भीहै तथा सुलभता भी है। वेदों में भी कहा है- ।दर्शपौर्णमास्याया यजेत्। अर्थात अमावस्या और पूर्णमासी को निश्चित ही यजन करें। वेदों में एकादशी या अन्य व्रतों उपवासों का तो कोई वर्णन ही नहीं आया है। व्रत करने से आध्यात्मिक लाभ तो होगा ही, साथ में भौतिक लाभ भी होगा। हम लोग दिन रात समय बिना समय भूखें हो या न हों, खाते ही रहते हैं। शरीरस्थ अग्नि को ज्यादा भोजन डाल कर मंद कर देते हैं। वह पद अग्नि भोजन को पूर्णतया पचा नहीं सकती, इसलिए अनेकानेक बीमारियाँ बढ़ जाती हैं, फिर डॉक्टरों के पास चक्कर लगाना पड़ता है। इन समस्याओं का समाधान भी व्रत करने से हो जाता है और यदि रोज-रोज नए-नए व्रत करोगे तो पेट में भूखा रहते-रहते अग्नि स्वयं बुझ जायेगी। फिर भोजन डालने से भी प्रज्वलित नहीं हो सकेगी और यदि महीनें में एक बार ही अमावस्या का व्रत करते हैं तो स्वास्थ्य का संतुलन ठीक से चल सकेगा।यह ही  अमावस्या व्रत का फल है। वेदों में अमावस्या का महत्व बताया है। उसके पश्चात किसी संत महापुरुष ने अमावस्या व्रत करना नहीं बदलाया। प्रथम बार जम्भदेव जी ने ही कहा है कि अमावस्या का व्रत करो। इसमें बहुत बड़ा रहस्य छुपा हुआ है। यह एक पृथक से अन्वेषण का विषय है। अमावस्या के दिन जब तक सूर्य चन्द्र एक राशि में रहें, तब तक कोई भी सांसारिक कार्य जैसे हल चलाना, करसी चलाना, दाँती, गडाँसी, कटाई, लुनाई, जोताई आदि तथा इसीप्रकार से गृहकार्य भी नहीं करना चाहिए। उस दिन तो केवल परमात्मा का भजन ही करना चाहिए। अमावस्या व्रत का फल भी शास्त्रों ने बहुत ऊँचा बतालाया है।



18. भजन विष्णु
सर्वज्ञ सर्वैश्वर परमपिता परमात्मा श्री विष्णु का ही भजन करना चाहिए। भज= सेवायाम् धातु से भजन शब्द बनता है। इसलिए भजन करने का अर्थ है कि विष्णु परमात्मा की ही सेवा करनी चाहिए, अन्य किसी देवी-देवताओं की सेवा पूजा नहीं करनी चाहिए। हम लोग परमात्मा की क्या सेवा कर सकते हैं, हमारे पास हमारा अपना निजी धन भी क्या है जो उनको दे सकें। और तो हमारे पास देने को कुछ नहीं है केवल एक अहंकार ही हमारे पास है वही हम दे भी सकते हैं। हम अहंकार को समर्पण करके आनंद विसर्जन नहीं हो जाता है तब तक न तो हम सेवा ही कर सकते, न ही नाम, जप, यज्ञ, संध्यादिक ही कर सकते, यदि कुछ किया भी जाता है तो वह केवल दिखावा ही होगा वास्तविकता से बहुत दूर होगा। अनेकानेक संतों ने नाम जप के संबंध में अपनी भिन्न-भिन्न राय प्रकट की है। किसी ने राम-नाम का जप बतलाया है तो किसी ने कृष्ण या शिव या अन्य कुछ और ही बतलाया है किन्तु जम्भेश्वरजी ने इन्हीं परम्परागत लीक से हटकर
विष्णु-विष्णु यही जप बतलाया है क्योंकि सभी लोग एकमत से स्वीकार करते हैं किसगुण साकार चाहे राम हो कृष्ण हो या शिव हो येसभी अवतार विष्णु के ही हैं। इन्हीं सभी का आदि मूल पुरुष विष्णु परमात्मा ही है इसीलिए एक विष्णु का जप स्मरण होने से सभी अवतारों का स्मरण हो जाता है मूल में पानी सिंचने से डालियां पत्ते आदि तो सभी हरे- भरे हो जाते हैं। किन्तु डालियां पत्ते आदि सींचोगे तो मूल हरा-भरा नहीं हो सकेगा। सभी अवतारों का समन्वय एक विष्णु में
ही हो सकता है इसीलिए विष्णु जप का ही आदेश दिया है जिससे एक का जप करने से सभी के जप का फल मिल जाता है।


19. जीव दया- जीवों पर दया करते हुए
उनका पालन-पोषण करें। सभी जीव अपने-अपने कर्मानुसार जीना चाहते हैं इसीलिए उनके जीवनमें हमें सहयोग देना चाहिए न कि उनके जीवन को समाप्त करके स्वकीय उदरपूर्ति करना ठीक है। जीओ और जीने दो यह एक सिद्धांत किसी हद तक ठीकहै किन्तु जीव दया पालनी के मुकाबले में काफीबौना पड़ जाता है स्वयं भी जीवें और दूसरे को मारें मत इससे आप किसी को मारते हुए को छूड़ा नहीं सकोगे और न ही पालन-पोषण ही कर सकोगे किन्तु जीव दया पालनी में तो न आप स्वयं ही किसी को मारेंगे और न ही किसी को मारने देंगे। इसीलिए यह सिद्धांत
गुरूत्तर है। इसीसिद्धांत के पालन करने की जम्भेश्वरजी महाराज ने आज्ञा दी थी। उनके शिष्य बिश्नोई पालन करते भी आए हैं तथा अद्यपर्यंत कर रहे हैं। इस नियम के बदौलत आज भी बिश्नोईयों के गांव में हरिण आदि वन्य जीव निर्भय से विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसा क्यों न हो बिश्नोई जन अपने प्राणों का बलिदान देकर भी शिकारियों से वन्य जीवों की रक्षा करते हैं। ऐसा एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने अपने प्राणोंत्सर्ग वन्य जीवों को बचाते समय किये
है। प्राचीन समय से ही ताम्र-पत्र राजाओं ने लिखकर दिये थे। तथा अब भी सरकार को इस नियम पालन करने के लिए मजबूर किया है। ।। अहिंसा परमो धर्म:।। अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है और हिंसा ही सर्वअधर्म पाप है। आप किसी को जीवन दे नहीं सकते, तो फिर लेने का क्या अधिकार है। जीव हिंसा अनाधिकार चेष्टा है। शब्दों में अनेक जगहों पर जीव हिंसा का खंडन किया है ।।सूल चूभीजै कर्क दुहेलो तो है, है जायो जीव त घाई।। तथा आधुनिकयुग के बुद्धिमान लोग भी जीव हिंसा का विरोध करते हैं। इनसे होने वाले पाप को न भी मानें तो भी शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक कष्ट रोग आदि तो अवश्य ही मांसाहारी को हो जाते हैं। इसीलिए सदा जीवों की रक्षा करते हुए उनका पालन- पोषण करना चाहिए।



20. रूंखलीला नहिं घावै
  हरा वृक्ष नहीं काटना चाहिए, क्योंकि वृक्ष हरा है, दिन-रात बढ़ता है, हवा जल भोजन आदि ग्रहण करता है। ये आवश्यक वस्तुयें नहीं मिलने पर सूख जाता है यानी मर जाता है। मनुष्यों की भाँति चल फिर नहीं सकतातो क्या हुआ चेतन शक्ति वाला तो है ही। तो फिरउसको काटने का यह मतलब हुआ कि आप जीवों का नाशकर रहे हैं। यह जीव हिंसा ही होती है। सभी जीवपरोपकारी ही होते हैं उनका अस्तित्व बहुत ही आवश्यक होता है कोई एक जाती विशेष लुप्त हो जाती है तो जीवों का संतुलन बिगड़ जाता है जिससे किसी जीव विशेष की वृद्धि हो जाती है जिससे
उपद्रव फैल जाता है। इसी परोपकार की श्रृंखला में वृक्ष सबसे अधिक परोपकारी है। कहा भी है ।। तरूवर सरवर संत जन चौथा वर्षे मेह, परमार्थ के कारणें चारों धारी देह। गुरु जम्भेश्वरजी के पास में लोग आ करके पूछा करते थे कि हे देव ! यहां मरूभूमि में हर वर्ष भयंकर अकाल पड़ जाते हैं इसका कोई उपाय बतलाइये। तब जम्भेश्वरजी ने उनसे ही कहा था ।।रूंख लीलो नहिं घावैं। हरेवृक्ष
नहीं काटना। तभी से लोगों ने हरे वृक्षकाटने बंद कर दिये फिर वापस वर्षा का आगमन हुआ तथा  खुशहाली हो गयी। आज की तरह बिना किसी यंत्रों द्वारा भी जम्भदेव जी इस बात को जानते थे, इसीलिए लोगों को बतलाया। नियम का पालन जब तक होता रहा तब तक तो खूब वर्षा होती रही। धीरे-धीरे बिश्नोई इतर लोगों ने वन काट डाले जिससे पुनःअकाल का विभीषिका का मुँह देखना पड़ा तथा वर्तमान में ऐसा ही हो रहा है। वर्तमान में जबकि वायु प्रदूषण चारों ओर फैल चुका है। सांस लेना मुश्किल हो गया, भयंकर अकाल पड़ने लगे तब हमारे विश्व के वैज्ञानिकों को चेता हुआ इस समस्या का समाधान खोजने लगे तो कोई उपाय नजर नहीं आया। केवल एक ही उपाय सामने है वह है हरे वृक्षों की रक्षा। इस भयावह स्थिति से सैकड़ों वर्ष पहले गुरु जम्भदेव जी ने सचेत किया था। उसी को ही हमें आज स्वीकारना पड़ रहा है। जोधपुर से दक्षिण पूर्व दिशा में खेजङी वृक्ष की रक्षा करते हुए 363 स्त्री-पुरुषों ने स्वेच्छा अपने प्राणों का बलिदानदिया था। जिसका चित्रण तत्कालीन कवि गोकुल जी ने अपनी साखी में किया है तथा इसी का विस्तार रूप से वर्णन जम्भसागर में साहब राम जी ने भी किया है। भले ही यह घटना इतिहास में नहीं आ सकी किन्तु सत्यता से नकारा नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त और भी छोटी-मोटी कई घटनायें हरे वृक्ष रक्षार्थ हो चुकी हैं। एक खेजङी का वृक्ष मानव के लिए बहुत ही परोपकारी सिद्ध हुआ है। यह वृक्ष छाया, फल, फूल,खाद, वर्षा, अच्छी फसल, ईधन के  लिए सुखी लकड़ी इत्यादि असंख्य जीवनदायिनी वस्तुयें प्रदान करता है। सदा ही धूप गर्मी, लू, ठण्ड सहन करके शीतलता आदि प्रदान करने वाले को बेरहमी से काट डालना कहा तक का न्याय है इसी बात को सचेत करने वाले सर्वप्रथम युग पुरुष गुरु जम्भेश्वर ही थे। तथा उनकी आज्ञा को स्वीकार
करके प्राणों का बलिदान देखकर रक्षाकरने वाले बिश्नोई ही थे।



21.अजर जरै- अजर जो कामक्रोधलोभ,
मोह, अहंकार आदि अब तक जले नहीं हैं इनको राख न होकर अग्नि रूप में स्थित होकर मानव को जलातेरहते हैं। इनको जला दिया जाय इनकी भस्मी ठंडीहो जायेगी तभी तुम्हें चैन पड़ेगा। यदि इनको जलाकर भस्मभूत नहीं किया तो ये मानव को सदा ही जलाते रहेंगे। कभी कामनायें जलाएगी तो उन्हीं कामनाओं से क्रोधरूपी अग्नि का विस्तार होगा और क्रोध अपना प्रसार करेगा तो लोभ पैदा हो जाएगा तथा लोभ से मोह उत्पन्न हो जाता हैकक मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और मोहित लोग सदा अहंकार करेगा अपने सदृश्य किसी अन्य को नहीं समझेगा तो नष्टता को प्राप्त हो जाएगा, इसलिए ये काम क्रोधादि कहीं आग लगा न दे उससे पहले ही सचेत होकर इनको ही ठंडा करना उचित होगा। जब तुम्हारे अहंकार की निवृत्ति हो जाएगी तो जीते जी मरे हुए के समान हो जाओगे ।।जीवत मरो रे जीवत मरो जिन जीवन की विधि जाणी।। जे कोई आवै हो हो करता आपज हुईये पांणी।। शब्दवाणी - जरणा यानी सहन शीलता ही जरणा है और जो जरणा रखता है वह जीते जी मृत के समान हो जाता है उसके लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं है
सम्पूर्ण कण-कण में एक परमात्मा की ज्योति का दर्शन करता हुआपरम पद को प्राप्त कर लेता है जीते जी तो जीवनमुक्त होकर जीता है अपार स्वर्ग सुख को प्राप्त करता है और मृत्यु पर भी मोक्ष को प्राप्त करता है। उसके लिए जीवन-मरण का कोई विशेष अर्थ नहीं होता, दोनों बराबर
ही होते हैं। उसके बंधन कारक काम क्रोधादि जल जाने सेबंधनों की रस्सी टूट जाती है। निर्मुक्त हो जाने से फिर वह कभी दुःख में नहीं गिरता जब तकबंधन की पाश में फँसा रहता है तभी तक दुःख रहता है। "रतन काया बैकुण्ठे वासो तेरा जरा मरण भय भाजूं" (शब्दवाणी)। बूढ़ापे तथा मृत्यु का भय ही अधिक कष्टदायक है वह ज्ञानी का नष्ट हो जाता है। इसलिए सभी को जरणा सहनशीलता रखनी चाहिए। सदा नम्रता से व्यवहारकरना ही मानवता की सफलता है।





22. रसोई
भोजन स्वकीय जाति के लोगों के हाथ का बना हुआ ही करना चाहिए। सर्वप्रथम जब गुरु जम्भेश्वरजी महाराज के शिष्य बिश्नोई बने थे, तब उनके सामने यह समस्या आ गई थी कि जो अपने पीछे परिवार के लोग बिश्नोई नहीं बने हैं उनके साथ भोजन कैसे किया जा सकता है क्योंकि उनकी क्रिया, आचार-विचार शुद्ध नहींथे। उन्होंने उन्नतीस नियम धारण नहीं किए हैं, उनसे पला भी नहीं छुवाना है। वे लोग आपकीमंडली में सम्मिलित नहीं हुए हैं इसलिए तुम्हारे लिए पराये हैं। उस समय यदि वह नियम न बतलाते तो यह पंथ आगे चल ही नहीं पाता। इस समुदाय की कोई मर्यादा ही स्थिर नहीं हो पाती क्योंकि तब तो बिश्नोई भीमांसाहारी, नशेड़ी, अपवित्र घरों में भोजन करेगा तो फिर नियमों का पालन कैसे करेगा। खानपान से ही सम्पूर्ण व्यवस्था बिगड़ जाती है और खानपान शुद्ध होता ए तो सब कुछ सुचारु रूप से चलता है। इसलिए गुरु महाराज ने कहा कि अब आप लोग सभी एक समाज में एक गुरु की छत्रछाया में तथा उन्नतीस धर्म नियमों की मर्यादा में बंध चुके हो। इसलिए खानपान की व्यवस्था भी एक समाज में अपने जैसे लोगों के हाथ का किया करो। चाहे वह प्राचीनकाल हो या वर्तमान समय, भोजन जल तो शुद्ध होना ही चाहिए। इसी बात को प्रत्येक व्यक्ति सहर्ष स्वीकार करेगा ही। अपवित्र स्थानों में अनजान जगहों पर भोजन जलादि ग्रहण करने से शरीर में अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं, मन में चंचलता तथा बुद्धि विकृत हो जाती है। जैसा खावे अन्न वैसा हो जावे मन, जैसा पीये पाणी वैसी बोले वाणी। यही कहावत चरितार्थ होती है। इसलिए प्रत्येक बिश्नोई के घर का विश्वास है वह कभीमांसाहारी नहीं होगा। अन्य लोगों के घर जहाँ पर धर्म नियमों का पालन नहीं होता है वहां का अन्न जल ग्रहण न करें, यही जम्भदेवजी की आज्ञा है।


23. --अमर रखावै--
मादा भेड़ बकरीयों का समूह तो इकट्ठा रह सकता है और लोग ऊन,दूध आदि के लिए पालते भी हैं किन्तु नर भेड़ या बकरा साथ में अधिक नहीं रह पाते जिससे उनको लोग कसाईयों कोदेते हैं। कसाई लोग उनकी हत्या कर देते हैं। उस समय भेड़ बकरी पालन करना ही लोगों का प्रमुख धंधा था। इस प्रकार से सैकड़ों बकरे कसाईयों के हाथ में पहुँच कर कट जाते थे। इतनी अधिक मात्रा में जीव हत्या देखकर जम्भेश्वरजी ने यह धर्म नियम बनाया था कि प्रथम तो बिश्नोई होकर भेड़
बकरी पालन करना ही छोड़ दो और यदि अति शीघ्र न छोड़ सको तो धीरे-धीरे कम करते-करते अपने आप ही छूट जाएगी। तब उस समय यह समस्या आ गई कि इन बकरों का क्या करें। जम्भेश्वर भगवान ने कहा कि इनको कसाईयों के हाथों न बेचो। यदि भेड़ों मेंइनको नहीं रख सकते तो इनका थाट बना दीजिए, जिसमें केवल बकरें ही रहेंगे। ये अमर ही रहेंगे अर्थात इनको कोई नहीं मारेगा। स्वतः ही अपनी मृत्यु से मर जायेंगे तो धीरे-धीरे अपने आप तुम्हारा भेड़ बकरीयों से पीछा छूट जायेगा। फिर कभी उन्हें पालना नहीं,यदि तुम्हें पशु पालन करना है तो गौपालन करो, तुम्हें अभूतमय दूध देगी। इस प्रकार से उन परिस्थितियों में इस धर्म नियम को बनाया था। जब धीरे-धीरे वे परिस्थितियाँ समाप्त हो गयी, बिश्नोईयों ने भेड़- बकरी पालन ही छोड़ दिया तो फिर थाट पालन करने का क्या औचित्य रह जाता है। किसी निरीह प्राणी की कसाईयों के हाथों से रक्षा करना कोई बुरी बात तो नहीं कही जा सकती। यदि थाट पालने का सामर्थ्य हो तो ऐसा भी कर सकते हैं। उतने जीवों की रक्षा हो सकेगी किन्तु यह नियम प्रत्येक बिश्नोई के लिए अनिवार्य रूप से पालन करने योग्य नहीं है। इसी वजह से अगर रखावें थाट यह परम्परा प्रायः खत्म हो चुकी है। अब केवल रोटू गांव में ही इस परम्परा का पालन हो रहा है।


24. --बैल बधिया--
बैल को बधिया न तो स्वयं करे और नही दूसरों को प्रेरणा देकर करवायें। जब बछड़ा हल चलाने लायक बड़ा हो जाता है तो लोग उसे कर देते हैं या करवा लेते हैं फिर उसे हल गाड़ी में चलाने के काम में लिया जाता है। यदि ऐसा न करें तो गाड़ी हल चलता नहीं है, काफी परेशान करता है। जब उसे नपुसंक  बनाया जाता है तो वह दृश्य अति करुणामय तथा कष्टदायक होता है। जो पीड़ा उस बछड़े को सहन करनी होती है उसकाकोई आर-पार नहीं हैं। उस समय की छटपटाहट दर्द और चिल्लाना देखने वाले कठोर हृदय मानव को भीपिघला देता है। इसलिए गुरु जम्भेश्वर भगवान ने बिश्नोईयों के लिए यह विशेष धर्म नियम बनाया कि बैल कॅ तपुंसक तुम लोग कभी नहीं करवाना, उस पाप का भागी कभी मत बनना। और न ही अपनी घर की गऊ के बछड़े को हल-गाड़ी ही चलाना औरन ही बधिया करवाना। जो तपुंसक हो चुके हैं, किसी द्वारा कर दिये गये हैं उन्हें खरीदकर अपना कार्य कर लेना। यह नियम भी विशेष रूप से किसानों पर ही लागू होता है क्योंकि व्यापारी या अन्य कार्यकर्ता के लिए ऐसी नौबत ही नहीं आती । यदि आती है तो फिर इस नियम का पालन अवश्यमेव करना चाहिए। यह नियम भी दया की वृद्धि करके जीव की पीड़ा को हरण करने वाला है। इस नियम का पालन भी बिश्नोईयों द्वारा दृढ़ता से होता आ रहा हैं।

25. --अमल--­

अफीम नहीं खाना चाहिए। अफीम एक भयंकर नशीला पदार्थ है इसके वशीभूत मानव जल्दी ही हो जाता है। दो-चार दिन ही लगातार खाते रहने से फिर कभी भी खाये बिना नहीं रह सकता है। शरीर के अंग-प्रत्यंग में अतिशीघ्रता से अपना असर जमा लेती है। जैसा अमल स्वयं काले रंग का होता है,वैसा ही खाने वाले का बना देती है। दिनोदिन इससे शरीर कमजोर होता चला जाता है और अफीम की पकड़ मजबूत होती चली जाती है। अफीम खाने वाले के सभी नियम धर्म शुभ कर्म छूट जाते हैं। अफीम मनुष्य को शारीरिक रूप से कमजोर करने साथ आर्थिक संकट में भी डाल देता है। इसमें यदि देखा जाए तो अवगुण तो असंख्य नजर आएँगे किन्तु गुण एक भी नहीं है। मानव जब धर्म नियम की मर्यादा एक बार भी भूलकर तोङ देता है तो फिर इस प्रकार की बरबादी में फँस जाता है , फिर निकलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कभी भी भूलकर भी अफीम नहीं खाना चाहिए और न ही छोटे बच्चों को खिलाकर अफीम खाने की आदत ही डालनी चाहिए। किसी कवि ने अफीम खाने वाले की धर्मपत्नी के दुःख दर्द को कविता में कितना सुंदर साकार किया है-- कोसत हो उस दोस्त को,जिन पोसत पीव न पीय को सिखायो। टूटी सी खाट पै ऐसो परो, मानो सासनै पूत को आजहि जायो। कर्म विकर्म भए पिय के सब, पोसत पीकर दुष्ट कहायो। बल बीरज नाश भया सगरो बपु, अंत समय पिय को इन गायो।
अफीम खाने वाला जीते जी ही इस दिव्य शरीर को नरकमय बना लेता है। मृत्यु पर भी वह शुभ कर्म न कर सकने गए कारण नरक में ही पड़ता है। इसलिए सभी को सचेत रहकर इस भयंकर कोढ से सदा ही अपनी रक्षा करनी चाहिए।


26. --तम्बाकू--
खाने पीने सूंघने के रूप में तम्बाकू का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी भयंकर हानीकारक वस्तु को गधे भी नहीं खाते किन्तु वाह रे मानव ! तूने इसका कई प्रकार से प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया है। आज तक तो इतिहास साक्षी है कि कोईभी तम्बाकू का सेवन करने वाला न तो स्वयं सुख शांति को प्राप्त हुआ है और न ही अपने पड़ोसी को सुख शांतिपूर्वक रहने दिया है। सर्वप्रथमतो तम्बाकू से अपने मन बुद्धि तथा शरीर को स्वयं कमजोर करता है और बाद में तम्बाकू की दुर्गंध से समीपस्त जनों को भी दूषित कर देताहै। प्राचीनकाल में तो गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इस महान कोढ से अवगत करवाकर सदा ही इससे अपनी रक्षा करने का उपाय बतलाया था। सभी को पाहल देकर प्रतिज्ञा करवायी थी। धीरे-धीरे समय पाकर आज इसने पुनः भयंकर रूप धारण कर लिया है। इससे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक, डॉक्टर,मनीषी बहुत ही चिंतित हो चुके हैं। नयी-नयी कानूनें बनवातेहैं, चेतावनी देते हैं, कि यह नशा ही मानवता की मौत का = संदेश है। इसीप्रकार यदि सभी लोग इस नशे के चक्कर में पड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जिस दिन मानवता नष्ट हो जाएगी। ये बने हुए एटम बम तो न जाने कब टूटेगे। इससे पहले ही यह तम्बाकू आदि का नशा मानवता को नष्ट कर देगा। इसलिए आजकल कई देशों में सामूहिक रूप से लोग नशे को छोड़ रहे हैं। ऐसा ही दुःख जाहिर किसी विद्वान ने किया है। उन्हीं के शब्दों में- "तम्बाकू और इंसान दोनों एक दूसरे को खाते हैं" बस यों ही खाया था मीठा पान और अब ? अब तो तम्बाकू सिगरेट की आदत छूटती ही नहीं। लेकिन मात्र लाचारी जाहिर करने से इस सच
को झूठलाया नहीं जा सकता कि स्वाद के नाम पर लिया गया तम्बाकू या तनाव घटाने के बहाने पी गयी सिगरेट के हर पैकेट के साथ आप जिंदगी को उस चौराहे की ओर ढकेल देते हैं, जहाँ से हर रास्ता आपको मौत के करीबले जाता है। 

27. _--भांग--_

भांग कदापि नहीं पीना चाहिए। भांग भी एक प्रकार का जहर है। शरीर को धीरे-धीरे काटता है। भांग पीने वाले को तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ कि मोटा हो रहा हूँ। किन्तु वास्तविकता से वह बहुत दूर होता है। शिवजी का नाम लेकर साधना भजन करने वाले
भी भांग को पवित्र मानकर पीते हैं। वहाँ पर नाम साधना कालेते हैं और भांग के नशे में धुत रहते हैं। इसी प्रकार से अपने जीवन को बरबाद करते देखे गए हैं। जीवन की वास्तविकता को नशा थोड़ी देर के लिए भूला सकता हैं जिसका यह तात्पर्य तो नहीं होता कि आप सदा के लिए ही दुःखों से छूट गए हैं। शिवजी की बराबरी करना तो ढोंग मात्र ही है। केवल तम्बाकू भांग से
शिवजी नहीं बना जा सकता। उसके लिए शिव जैसी तपस्या करनी होगी। भांग पीने वाले अर्ध विक्षिप्त तो होते ही हैं कभी-कभी उन पर अधिक भांग सेवन से पूर्णतया पागलपन आ जाता है। ऐसे समय में जीवनसे भी हाथ धो बैठते हैं। "भांग भखंत ध्यान ज्ञान खोवंत, यम दरबार ते प्राण रोवन्त" गोरखवाणी" भांग पीने से ज्ञान ध्यान, नष्ट हो जाते हैं तथा इस जीवन में दुःख उठाते हुए मृत्यु पर यमराज के दूतोंद्वारा मार पड़ने पर फिर प्राण रोयेंगे। इसलिए कभी भी भांग
नहीं पिनी चाहिए।

28. _--मद्य मांस--_
मनुष्य को कभी शराब नहीं पीना चाहिए। यदि जिसने भी शराब का सेवन कर लिया तो समझौ फिर उसने मांस भी खा लिया इसलिए मद्य मांस दोनों को एक ही नियम के अंतर्गत रखे गए हैं। इन दोनों में से एक कर्म कर लिया तो फिर दूसरा भी करने में कोई संकोच नहीं होगा। शराब पीने में अनेक अवगुण शास्त्रकारों ने तथा महापुरुषों ने बताए है- चित्ते भ्रान्तिजयिते मद्यपानाद् भ्रांते चित्ते पाप चय्-र्यमुपैति । पापं कृत्वा दुर्गतिं यान्ति,मिढास्तस्मान्मद्यं नैवपेयं नैव पेयम्।।रत्नाकर।। मद्यपान करने से चित्त में भ्रांति उत्पन्न हो जाती है तथा भ्रांत चित्त से पाप कर्म
ही हो सकते हैं और पापों को करके तो दुर्गति को प्राप्त होता है इसलिए हे मूढ़ ! मद्यपान न करो, न करो। यही सलाह जम्भेश्वर भगवान ने दी थी। क्योंकि सभी अनर्थों का मूल यह शराब ही है। इस अनर्थ के पीछे सभी पाप, अनर्थ चले आते हैं। ऐसा हम लोग व्यवहार में देखते भी हैं। तथा च मद्यपान के और भी अवगुण है। द्यूतं च मांसं च सुरा च वैश्या, पापादि चौर्य परदार सेवा। एतानि सप्त व्यसनानि लोके, पापाधिके पुन्सि सदा भवन्ति ।। सुरापान करने से अन्य व्यसन जैसे जुआ खेलना, मांस खाना, वैश्या गमन करना, चोरी करना, परस्त्री की सेवा करना तथा पापों की अधिकता हो जाना इत्यादि होते हैं। जो मानव को पतित कर देते है। इसलिए मानवता की रक्षा के लिए व्यसनों के मूलरूप शराब को ही काट डालना चाहिए। यदि इस मूल को पानी सिंचते रहे तो फिर कभी भी मानव व्यसनों से छुट्टी पा सकेगा। अपना तथा अपने संबंधियों का जीवन बरबाद कर डालेगा। शराब पीने के पश्चात मनुष्य सुध-बुद्ध खो बैठता है। उसे किसी प्रकार की मर्यादा का भानही नहीं रहता है ऐसे समय में वह कुछ भी कुकर्मकर सकता है। ऐसी कामना करने से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब तक जो भी भयंकर अनर्थ हुए हैंवे सभी इसी मद्यपान के बदौलत ही हुए हैं, सभी झगड़े झंझटों का मूल यह गंदा पानी ही है। इसीलिए ऐसा विचार करके इसका त्याग करें तथा करवायें इस जीवन को स्वर्गमय बनाए तथा बनवायें इससे बढ़कर और कोई जीवन का लाभ नहीं होगा। मांस नहीं खाना इसकी व्याख्या तो जीव दया पालणी के अंतर्गत ही हो गई है पुनः व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं 

29._--निला वस्त्र धारण न करें--_
इस नियम द्वारा स्पष्टतया नीला वस्त्र धारण करना बिश्नोई के लिए सर्वथा निषेध किया है क्योंकि स्वभाव से जो सफेद वस्त्र हैं उसको नीले रंग से रंगा जाता है वह रंग ही मूलतः अशुद्ध होता है। इसकी उत्पत्ति तथा रंगाई दोनों ही अपवित्रता से होती है ऐसीशास्त्रों में मान्यता है। इसलिए स्मृति ग्रंथों में नीले वस्त्र धारण निषेध किया है- यथा स्नानं दानं जपो होम:, स्वाध्याय पितृ तर्पणम्। पंचयज्ञा वृथा तस्य नीली वस्त्रस्य धारणात् । नीले वस्त्रों को पहनकरयदि कोई नित्य- प्रति स्नान करे, सुपात्र को दान दें, सायं प्रातःकाल हवन करें या स्वाध्याय अतिथि सेवा आदि शुभ कर्म करें तो भी उन शुभ कर्मों का फल नष्ट हो जाता है तथा अन्य भी बहुत से प्रमाण श्रुति शास्त्रों में नीले वस्त्र निषेध संबंध में दिए हैं। बाल्मीकीय रामायण में अयोध्या नरेश त्रुशंकु की कथा आती है त्रिशंकु प्रथम तो अपने कुलगुरु के पास जाकर सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा प्रकट करता है जब वशिष्ठ जी मना कर देते हैं तो वशिष्ठ पुत्रों के पास जाकर निवेदन करता है तो वशिष्ठ पुत्र त्रिशंकु को इस प्रकार से शाप देते हैं कि वह चाण्डाल हो जाता है। "अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चाण्डालतां गतः, नील वस्त्रों नील पुरुषो ध्वस्त मूर्धज:! चित्य माल्यांग रागश्च, आयसा भरणोभवत् । तदन्नतर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गए। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रूक्षता आ गयी। शिर के बाल छोटे-छोटे हो गये।सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथा स्नान लोहे के गहने
पड़गए। इसलिए नीले वस्त्र पहनना चाण्डाल का लक्षण होता है चाण्डाल राक्षस लोग ही इस रंग
को पसंद करते हैं क्योंकि जैसी जिसकी भावना होती है वह बाह्य परिधान भी वैसा ही ग्रहण करेगा। बिश्नोईयों को तो चाण्डालता से निवृतकरके देव तुल्य बनाया था इसीलिए सफेद या अन्यरंग नीले को छोड़कर पहनने की आज्ञा दी थी। क्योंकि वस्त्रों का प्रभाव भी मन बुद्धि शरीर
स्वभाव पर बहुत ज्यादा पड़ता है। सभी की अपनी-अपनी ड्रेस(परिधान) होता है। उससे समाज पर प्रभाव विशेष पड़ता है। सेना, वकील, जज, भक्त, साधु, संन्यासी इन्हीं की अपनी-अपनी पोषाकें हैं
जिससे भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। यदि आप नीले वस्त्र धारण करेंगे तो आपके अंदर चांडालता, राक्षस, दुष्टपना अवश्य ही आयेगा। और वही आप यदि भक्त, साधु, सज्जन पुरुष का सौम्य शुभ्र, पीत या लाल वर्ण के कपड़े पहनेंगे तो आपका प्रभाव भावनायें अति उत्तम होगी। इसीलिए राक्षसी परिधान त्याग करके भक्त का यह सफेद वस्त्र पहनना गुरु जी ने बतलाया था।
कुछ वैज्ञानिक लोग नीले वस्त्र में दोष बतलाते हुए कहते हैं कि यह हिन्दुस्तान गर्म देश है इसमे
गर्मी अधिक पड़ने का कारण सूर्य की किरणें यहां पर सीधी पड़ती हैं और वे किरणें नीले रंग की ओर आकर्षित ज्यादा ही होती हैं। सूर्य की किरणों से विपरीत रंग होता होता है जिससे सूर्य की किरणों को नीला वस्त्र खींचता है। जिससे गर्मी ज्यादा लगेगी। नीले वस्त्र से छनकर आयी हुई गर्मी स्वास्थ्य के लिए अति हानीकारक होती है तथा सफेद वस्त्र पर सूर्य की किरणें अपना प्रभाव नहीं डाल सकती वस्त्र पर पड़ते ही फिसल जाएगी शरीर तक अपना प्रभाव नहीं जमा पाएगी और यदि यत्किचिंत जमाती है तो भी शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक ही होती है। इसीलिए सफेद वस्त्र ही धारण करना चाहिए नील वस्त्र सभी दृष्टियों से हानीकारक सिद्ध हुआ है। नीले या काले वस्त्र में मेल गंदगी अपवित्रता का साम्राज्य होता है। क्योंकि वहआँखो से तो दिखाई नहीं पड़ता है सफेद वस्त्र में मेल छिपाने की गुंजाइश जरा भी नहीं होती।सफेद वस्त्रों से भक्त की पहचान होती है और नीले वस्त्रों से चाण्डाल दृष्टता की पहचान होती है। इसीलिए जम्भदेव जी ने जब बिश्नोई बनाए थे तब सभी के लिए यह नियम लागू करते हुए बताया था कि अब आप लोग भक्त सज्जन हो चुके हैं आपकी पहचान सफेद वस्त्रों द्वारा होगी। आप लोग हृदय की कालुष्यता त्याग चुके हैं तो अब
वस्त्रों की कालुष्यता भी त्याग दीजिए। यही नील वस्त्र त्याग रूपी नियम को बताने का उद्देश्य था और यह नियम सर्वथा शास्त्र सम्मत, वैज्ञानिकों की कसौटी पर खरा उतरने वाला है यदि इसके संबंध में संदेह होता है तो अवश्य ही विचार करके देखिए समाधान मिलेगा। 

विशेष:- इस प्रकार से 29 नियम की व्याख्या पूर्ण होती है तथा 29 नियम की व्याख्या के अंत में एक दोहा भी कहा है जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं--
उन्नतीस धर्म की आखड़ीहिरदै धरियो जोय।
जाम्भे जी किरपा करीनाम बिश्नोई होय॥

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